ज़ेरोधा के सीईओ नितिन कामथ बोले – “स्ट्रोक के लक्षण दिखें तो तुरंत कदम उठाएं, पहले 4.5 घंटे हैं सबसे जरूरी”
व्यापार: जेरोधा के सीईओ नितिन कामथ ने अपने स्ट्रोक के अनुभव को साझा करते हुए युवाओं को गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि स्ट्रोक के लक्षण दिखते ही अस्पताल पहुंचना बेहद जरूरी है, क्योंकि इलाज की गोल्डन ऑवर महज 4.5 घंटे की होती है।
कामथ ने बताया कि जनवरी में स्ट्रोक आने के बाद उन्होंने पहले इसे हल्के में लिया और आराम कर लेने से ठीक होने की उम्मीद की। उन्होंने लिखा कि अगर उस वक्त मैंने कुछ अलग किया होता, तो वो होता सीधा अस्पताल जाना, सोने की कोशिश नहीं।
मुझे कुछ नहीं होगा वाला रवैया खतरनाक
उन्होंने स्वीकार किया कि 'मुझे कुछ नहीं होगा' वाला रवैया ही देरी का कारण बना, और यह सोच खासकर 50 साल से कम उम्र वालों में ज्यादा देखने को मिलती है। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में 30 से 50 साल के लोगों में स्ट्रोक के मामलों की संख्या लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
स्ट्रोक से आप क्या समझते हैं?
स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है, जो तब होती है जब मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त का प्रवाह रुक जाता है। यह एक बहुत ही गंभीर स्थिति है और इसके कारण स्थायी मस्तिष्क क्षति, विकलांगता या मृत्यु हो सकती है।
स्ट्रोक के बाद उपचार की समयसीमा होती है बेहद ही कम
स्ट्रोक के बाद उपचार की समयसीमा बहुत ही कम होती है। आमतौर पर, इंट्रावेनस थ्रॉम्बोलिसिस (रक्त-थक्का घोलने वाली इंजेक्शन) के लिए पहला 4.5 घंटे और मेकैनिकल थ्रॉम्बेक्टॉमी (कैथेटर माध्यम से थक्का निकालने की प्रक्रिया) के लिए लगभग 6 घंटे सबसे उपयुक्त माने जाते हैं।
'समय मतलब मस्तिष्क' यह चिकित्सकीय कहावत इस बात को दर्शाती है कि जितनी देर इलाज शुरू होगा, उतना अधिक मस्तिष्क क्षतिग्रस्त होगा, जिससे लकवा, भाषण या स्मृति संबंधी समस्या या मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है। जल्द इलाज के लिए पहुंचना आपको बचा सकते हैं और बेहतर सुधार की संभावना बढ़ाते हैं।
गोल्डन ऑवर के भीतर अस्पताल पहुंचे
विश्लेषण बताते हैं कि आधे से भी कम स्ट्रोक रोगी इस गोल्डन ऑवर के भीतर अस्पताल पहुंच पाते हैं। डॉक्टर कहतें हैं कि जितनी देर इलाज में विलंब होगा, उतने अधिक मस्तिष्क-कोशिकाएं नष्ट होंगी। अगर रोगी इस समयसीमा से बाहर अस्पताल पहुंचते हैं, तो वे अभी भी इलाज करवा सकते हैं लेकिन सुधार पहले जितना तेज या प्रभावी नहीं होगा।
खराब जीवशैली की वजह से युवाओं के बीच बढ़ रही स्ट्रोक की संख्या
हाल के वर्षों में युवाओं की बीच स्ट्रोक की संख्या बढ़ी है। इसके पीछे कारण माने जा रहे हैं, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, निष्क्रिय जीवनशैली, अत्यधिक तनाव, नींद की कमी, धूम्रपान और शराब सेवन जैसे जीवनशैली-सम्बंधित कारक।
विशेषज्ञों का कहना है कि लगभग 60 % स्ट्रोक रोगी और युवा पीढ़ी यह नहीं जानते कि स्ट्रोक के समय में तत्काल इलाज कितना अहम है। इस वर्ष के वर्ल्ड स्ट्रोक डे का थीम है 'हर मिनट कीमती है'। इसलिए, अगर किसी को स्ट्रोक के लक्षण दिखें जैसे अचानक हाथ-पैर का कमजोर होना, चेहरे का झुकाव, बोलते समय दिक्कत तो वे तुरंत अस्पताल की ओर निकलें। अगर मरीज चल-फिर सकते हों, तो खुद वाहन, ऑटो-रिक्शा या कैब का उपयोग करें, केवल गंभीर अवस्था वाले या वरिष्ठ नागरिकों को एम्बुलेंस का इंतजार करना चाहिए।

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