ईंधन की बढ़ती कीमतें सीधे उपभोक्ताओं पर: आटा-दाल और जरूरी चीजों की बढ़ी हुई दर
नई दिल्ली। आने वाले दिनों में आम जनता की रसोई का बजट और घरेलू खर्चों का बोझ काफी बढ़ सकता है। आटा, दाल, पैकेट बंद खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा के इस्तेमाल की अन्य जरूरी चीजों की कीमतों में भारी उछाल आने की पूरी आशंका बन गई है। पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल और ईंधन के दामों में हो रही बढ़ोतरी ने देश की दिग्गज एफएमसीजी कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे उनकी माल ढुलाई और उत्पादन लागत में भारी इजाफा हुआ है और इसका सीधा असर अब उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने जा रहा है।
लागत का बढ़ता बोझ और वजन कम करने की कॉर्पोरेट रणनीति
ईंधन की कीमतों में संशोधन के बाद से कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर नया दबाव देखने को मिल रहा है। बाजार के सूत्रों और कॉर्पोरेट अधिकारियों के मुताबिक, कच्चे माल और परिवहन के बढ़ते खर्च की भरपाई करने के लिए कंपनियां अब दोतरफा रणनीति पर काम कर रही हैं। इसके तहत या तो चुनिंदा उत्पादों के खुदरा दामों में सीधे तौर पर बढ़ोतरी की जाएगी या फिर पैकेट की कीमतों को स्थिर रखते हुए उनके भीतर मिलने वाले सामान का वजन यानी ग्रामेज कम कर दिया जाएगा, ताकि आम ग्राहकों को सीधे तौर पर झटका न लगे।
दिग्गज एफएमसीजी कंपनियों की तैयारी और मूल्य वृद्धि का खाका
देश की बड़ी एफएमसीजी कंपनियों ने बदलती परिस्थितियों के बीच अपनी अर्निंग कॉल में इस बात के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि यदि महंगाई का यह दबाव इसी तरह बना रहा, तो वे कीमतों में बदलाव करने से पीछे नहीं हटेंगी। डाबर इंडिया के ग्लोबल सीईओ मोहित मल्होत्रा के अनुसार, कंपनी ने अपने विभिन्न उत्पादों के दामों में पहले ही चार प्रतिशत तक की वृद्धि कर दी है और आने वाले समय में वे एक और दौर की मूल्य वृद्धि पर विचार कर रहे हैं। इसी तरह पार्ले प्रोडक्ट्स के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर मयंक शाह, हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल), ब्रिटानिया और नेस्ले जैसी कंपनियों के शीर्ष प्रबंधन ने भी स्वीकार किया है कि कच्चे तेल की कीमतों में आ रही अस्थिरता उनके लिए बड़ी चिंता का विषय है और माल ढुलाई के खर्चों की बारीकी से निगरानी करने के बाद कीमतों को बढ़ाना ही उनका अंतिम विकल्प होगा।
मांग में सुधार पर संकट और ग्रामीण बाजारों पर संभावित असर
यह पूरा घटनाक्रम एक ऐसे नाजुक समय पर सामने आया है, जब पिछले साल माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों में हुई कटौती के बाद बाजार में ग्राहकों की मांग और खरीदारी के ढर्रे में सुधार होना शुरू ही हुआ था। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईंधन की कीमतें कई तिमाहियों तक इसी तरह ऊंचे स्तर पर बनी रहीं, तो लगातार होने वाली इस मूल्य वृद्धि का सबसे बुरा असर देश के ग्रामीण बाजारों पर पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ता कीमतों में मामूली बदलाव को लेकर भी बेहद संवेदनशील होते हैं, ऐसे में पैकेट का आकार घटने या दाम बढ़ने से वहां उपभोग की रफ्तार सुस्त पड़ सकती है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था की विकास दर प्रभावित होने का खतरा पैदा हो जाएगा।

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