चुनाव कराने को तैयार आयोग, ओबीसी आरक्षण पर सरकार के फैसले का इंतजार
जयपुर। राजस्थान में स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में हो रही देरी को लेकर छिड़े सियासी और कानूनी घमासान के बीच राज्य निर्वाचन आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है। मुख्य चुनाव आयुक्त राजेश्वर सिंह ने साफ तौर पर कहा है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण तय करने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की नहीं, बल्कि प्रदेश सरकार की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशासन जिस दिन भी इस आरक्षित वर्ग की सूची और वार्डों का निर्धारण पूरा करके आयोग को सौंप देगा, उसके मात्र दो दिनों के भीतर चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया जाएगा।
आरक्षण निर्धारण पर निर्वाचन आयोग का रुख
मुख्य चुनाव आयुक्त राजेश्वर सिंह ने कहा कि वार्डों और विभिन्न पदों के वर्गवार आरक्षण की प्रक्रिया को पूरा करना पूरी तरह से राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। यदि सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट का इंतजार किए बिना ही ओबीसी आरक्षण को लेकर कोई बड़ा फैसला लेना चाहती है, तो वह निर्णय लेने के लिए भी स्वतंत्र है। निर्वाचन आयोग का काम केवल सरकार द्वारा आरक्षण की इस कानूनी प्रक्रिया को पूरा किए जाने के बाद निष्पक्ष तरीके से चुनाव संपन्न कराना है। जैसे ही शासन स्तर पर यह कार्य पूरा होगा, आयोग बिना किसी देरी के केवल दो दिनों के भीतर चुनावी अधिसूचना जारी कर देगा।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी और आयोग का पक्ष
इससे पहले राजस्थान उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सूबे में स्थानीय चुनाव टलने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए सरकार को पांच दिनों के भीतर चुनाव की तारीखें तय करने का अल्टीमेटम दिया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने निर्वाचन आयोग की भूमिका को लेकर भी सख्त रुख अपनाया था। इसके जवाब में मुख्य चुनाव आयुक्त ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि आरक्षण का ढांचा तैयार करना पूरी तरह सरकार का काम है और इसमें आयोग की कोई सीधी भूमिका नहीं होती है। उन्होंने अदालत को भरोसा दिलाया कि जैसे ही पदों के आवंटन का काम पूरा होगा, चुनावी कार्यक्रम तुरंत घोषित कर दिया जाएगा।
आगामी सुनवाई और कार्ययोजना की प्रस्तुति
उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार अब पिछड़ा वर्ग आयोग को तय समय सीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी, जिसके आधार पर राज्य सरकार आरक्षण की अंतिम रूपरेखा तैयार करेगी। इस पूरे मामले में आगामी 20 जुलाई को बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है, जिसमें राज्य सरकार, पंचायती राज विभाग, स्वायत्त शासन विभाग और राज्य निर्वाचन आयोग को अपनी विस्तृत कार्ययोजना के साथ अदालत के समक्ष उपस्थित होना होगा। इस दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ने मीडिया की भूमिका पर भी बात की और कहा कि खबरों को बिना किसी मिर्च-मसाले या अतिशयोक्ति के पूरी सत्यता और प्रमाणिकता के साथ जनता के सामने रखना बेहद जरूरी है।
चुनाव टलने पर अदालत की सख्त चेतावनी
अदालत में हुई पिछली सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने दोनों पक्षों को आड़े हाथों लेते हुए पूछा था कि आखिर किस नियम के तहत चुनाव कराने के लिए 90 दिनों का अतिरिक्त समय मांगा गया। इस पर आयोग ने स्पष्ट किया कि समय बढ़ाने की मांग वाला पत्र राज्य सरकार के आग्रह पर भेजा गया था, जबकि आयोग समय पर चुनाव कराने के लिए पहले ही सरकार को कई बार सचेत कर चुका था। अदालत ने पिछड़ा वर्ग आयोग को स्पष्ट चेतावनी दी है कि उन्हें 14 अगस्त तक का लंबा समय नहीं दिया जाएगा और उन्हें जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी ताकि चुनाव की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा सके।

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