शारीरिक और मानसिक बदलावों का दौर: पेरिमेनोपॉज को समझना है जरूरी
महिलाओं की जिंदगी में एक ऐसा समय आता है जब उनका शरीर धीरे-धीरे हार्मोनल बदलावों की ओर बढ़ता है, जो मेनोपॉज यानी मासिक धर्म के पूरी तरह बंद होने पर खत्म होता है। इस चरण को ही पेरिमेनोपॉज कहा जाता है। यह समय मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से महिलाओं के लिए चुनौती भरा हो सकता है क्योंकि शरीर में हो रहे बदलाव अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे होते हैं और कई बार समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर चल क्या रहा है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, पेरिमेनोपॉज वह अवधि होती है जो मेनोपॉज से कुछ साल पहले शुरू होती है। इस दौरान महिला के शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन का स्तर ऊपर-नीचे होने लगता है। यही हार्मोन असंतुलन कई तरह के लक्षणों को जन्म देता है, जैसे अनियमित पीरियड्स, मूड स्विंग्स,चिड़चिड़ापन, नींद में कमी, शरीर में गर्माहट , थकान और यौन इच्छा में बदलाव। कुछ महिलाओं को इस दौरान बहुत भावनात्मक उतार-चढ़ाव का सामना भी करना पड़ता है.
ये बदलाव कब होते हैं?
आमतौर पर पेरिमेनोपॉज 40 की उम्र के बाद शुरू होता है, लेकिन कुछ महिलाओं में यह 35 की उम्र के बाद भी देखने को मिलता है। यह कुछ महीनों से लेकर कई साल तक चल सकता है, जब तक महिला का मासिक धर्म पूरी तरह से बंद न हो जाए। कुछ लोगों के लिए यह फेज बिल्कुल हल्का होता है, जबकि कुछ को यह काफी परेशान कर सकता है।पेरिमेनोपॉज के लक्षणों से राहत पाने के लिए हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (एचआरटी) एक विकल्प हो सकता है, लेकिन बहुत-सी महिलाएं केवल अपने जीवनशैली में कुछ हेल्दी बदलाव करके भी खुद को बेहतर महसूस कर सकती हैं। यहां हम कुछ ऐसे सरल और असरदार उपाय बता रहे हैं, जो पेरिमेनोपॉज़ के दौरान होने वाली परेशानियों को कम करने में मददगार हो सकते हैं। पहले तो बता दें कि पेरिमेनोपॉज कोई बीमारी नहीं है, बल्कि यह शरीर का नेचुरल बदलाव है. लेकिन इससे होने वाली परेशानियों को कम जरूर किया जा सकता है, वो भी दवाइयों के बिना, कुछ जीवनशैली में बदलाव और प्राकृतिक उपायों से. इस समय शरीर को अधिक पोषण की जरूरत होती है. इसलिए डाइट में कैल्शियम, आयरन, ओमेगा-3 फैटी एसिड और विटामिन डी जरूर शामिल करें। हरी सब्जियां, फल, दालें, दूध, दही और मेवा का सेवन करें। रोजाना योग, वॉक या हल्का स्ट्रेचिंग करने से न केवल शरीर में ऊर्जा बनी रहती है, बल्कि मूड भी बेहतर होता है और नींद अच्छी आती है। नींद की कमी से मूड स्विंग्स और थकावट बढ़ सकती है। इसलिए कोशिश करें कि हर दिन कम से कम 7-8 घंटे की नींद लें। मेडिटेशन, डीप ब्रीदिंग और अपना मनपसंद शौक अपनाकर तनाव से राहत पाने की पूरी कोशिश करें। इसके अलावा यह समझना जरूरी है कि यह फेज हर महिला के जीवन में आता है। ज्यादा जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेना सबसे बेहतर उपाय है।

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