‘लोकतंत्र खतरे में’—ममता बनर्जी ने BJP और चुनाव आयोग को घेरा
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्ता से बेदखल होने के बाद भी तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के तेवर ढीले नहीं पड़े हैं। चुनावी परिणामों में मिली शिकस्त को उन्होंने जनादेश के बजाय 'चुनावी डकैती' करार देते हुए भाजपा और चुनाव आयोग के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। अपनी हार को स्वीकार करने के स्थान पर उन्होंने एक नई राजनीतिक लड़ाई का ऐलान करते हुए कहा कि वह इस झटके से भयभीत नहीं हैं और जल्द ही और अधिक शक्ति के साथ मैदान में वापसी करेंगी। उनके इस आक्रामक रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल की राजनीति में आने वाले दिन काफी गहमागहमी भरे रहने वाले हैं।
चुनाव आयोग और भाजपा पर तीखे प्रहार
ममता बनर्जी ने अपनी हार का मुख्य कारण भाजपा द्वारा की गई कथित बेईमानी और संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग को बताया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि भाजपा ने सुनियोजित तरीके से 100 से अधिक सीटों पर जीत छीनी है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए दीदी ने इसे भाजपा का 'कमीशन' तक कह डाला। उन्होंने दावा किया कि चुनाव के दौरान की गई उनकी शिकायतों को अधिकारियों ने पूरी तरह अनसुना कर दिया। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पर निशाना साधते हुए उन्होंने इस पूरी चुनावी प्रक्रिया को अनैतिक और गैर-कानूनी करार दिया और इसे लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय बताया।
सत्ता विरोधी लहर और आंतरिक चुनौतियां
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 15 वर्षों के लंबे शासन के बाद टीएमसी को तीव्र सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकम्बेंसी) का सामना करना पड़ा। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, बेरोजगारी और राज्य के आर्थिक पिछड़ेपन ने जनता के भीतर असंतोष पैदा किया, जिसे भाजपा ने बखूबी भुनाया। इसके अलावा, राज्य में हुए तीव्र धार्मिक ध्रुवीकरण ने टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई। हिंदू मतों के एकीकरण और तुष्टीकरण के आरोपों ने ममता बनर्जी के अभेद्य माने जाने वाले कई गढ़ों को ढहा दिया, जिससे पार्टी की सीटों का आंकड़ा गिरकर रसातल में चला गया।
गुटबाजी और सांगठनिक विफलता का असर
पार्टी की इस हार के पीछे केवल बाहरी कारण नहीं, बल्कि टीएमसी के भीतर व्याप्त आंतरिक कलह और गुटबाजी को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। अभिषेक बनर्जी द्वारा दी गई चेतावनियों के बावजूद स्थानीय नेताओं के व्यवहार में सुधार नहीं हुआ, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के मतदाताओं में नाराजगी बढ़ी। पुराने और अनुभवी सहयोगियों का पार्टी छोड़कर जाना टीएमसी के लिए आत्मघाती सिद्ध हुआ। बदलते परिवेश में मतदाताओं की नई आकांक्षाओं को समझने में पार्टी की विफलता ने इस पराजय की नींव रखी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी इन आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटकर अपनी पार्टी को कैसे पुनर्जीवित करती हैं।

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